पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज का दतिया आगमन
9 जुलाई 1929
श्री पीताम्बरा माई के विग्रह की स्थापना
23 मई 1935
राष्ट्र रक्षा अनुष्ठान
19 दिसम्बर 1962
श्री धूमावती माई के विग्रह की स्थापना
13 जून 1978
पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज का महानिर्वाण
3 जून 1979
ब्रह्म यज्ञ
1974
एक सनातनी का कर्तव्य है कि वह शक्ति, शिव, विष्णु, गणेश व शिव कुल के पञ्चायतन देवता का पूजन व ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ व अतिथि यज्ञ इत्यादि पञ्च महायज्ञ नित्य करे।
इस क्रम में ब्रह्म यज्ञ वेद शास्त्र का नित्य स्वाध्याय है।
कलिकाल के प्रभावी होने के कारण यह पञ्चयातन पूजा व पञ्चमहायज्ञ शिथिल है इस कारण से आज सनातन धर्म पृथ्वी से विमुख हो रहा है, ऐसा प्रतीत होता है।
सनतान धर्म को पृथ्वी पर पुनः स्थिर करने के उद्देश्य से श्री महाराज जी ने ब्रह्म यज्ञ का आयोजन किया। यह ब्रह्म यज्ञ अपने आप में वृहदतम था इसमें वेद की किसी एक शाखा का पाठ नहीं किया गया वरन चारों वेदों की समस्त शाखाओं का षडङ्ग सहित पाठ हुआ। ऐसा विलक्षण यज्ञ इससे पूर्व सम्राट युधिष्ठिर ने किया था।
यज्ञ के अवसर पर एक वेदमूर्ति की वाणी अचानक भरभरा कर बंद हो गई तब श्री महाराज जी ने स्वयं कृष्ण यजुर्वेद का वह पाठ पूरा किया।
बाद में आपश्री ने बताया कि इस अनुष्ठान को विफल करने हेतु आसुरी शक्तियां सक्रिय थी जिनको रोकने हेतु आपने एक विशिष्ट अनुष्ठान किया था। यह यज्ञ श्री महाराज जी के सनातन धर्म के उद्धार के महान प्रयासों को दर्शाता है।